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मालवा का खरमौर: लौटना बंद क्यों हुआ?

Monsoon mein jab Malwa ki ghaasbhoomi hari hoti hai, tab Kharmour lautna chahiye. Lekin Sailana aur Sardarpur ke abhayaranyon mein yeh pakshi varshon...

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खरमौर पक्षी (Lesser Florican) — मालवा में संकट Sypheotides indicus | रील निर्माण हेतु विस्तृत प्रामाणिक तथ्य-संकलन (विस्तारित संस्करण) तैयार दिनांक: 5 सितम्बर 2026 | उद्देश्य: सरदारपुर व सैलाना अभयारण्य पर आधारित शैक्षणिक/जागरूकता रील 1. पक्षी परिचय व संरक्षण श्रेणी खरमौर (अंग्रेज़ी: Lesser Florican, वैज्ञानिक नाम: Sypheotides indicus) भारत में पाई जाने वाली बस्टर्ड-प्रजाति के तीन सदस्यों — ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (सोन चिरैया), खरमौर और बंगाल फ्लोरिकन — में सबसे छोटा पक्षी है। मध्यप्रदेश में इसे "खर तीतर" तथा मालवा क्षेत्र में ग्रामीण भाषा में "भटकुकड़ी" कहा जाता है। यह घास के मैदानों के कीड़े-मकोड़े खाकर पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखता है, इसलिए किसानों का प्राकृतिक मित्र भी माना जाता है। यह वर्षा ऋतु (जुलाई–अक्टूबर) में प्रजनन के लिए घास के मैदानों में पहुँचता है, इसलिए इसे "बारिश का अग्रदूत" भी कहा जाता है। Pashudhan & Animal Science; IndiaSpend हिंदी संरक्षण श्रेणी में बढ़ता संकट — समयरेखा वर्ष / अवधि स्थिति केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा संकटापन्न (Endangered) घोषित IUCN रेड लिस्ट (प्रारम्भ में) लुप्तप्राय (Endangered) बर्डलाइफ इंटरनेशनल मूल्यांकन, 2021 अति संकटग्रस्त (Critically Endangered) — श्रेणी उन्नयन स्रोत: IndiaSpend हिंदी (ISignal), 18 अगस्त 2022 — IUCN रेड लिस्ट व बर्डलाइफ इंटरनेशनल मूल्यांकन सन्दर्भ सहित विशेषज्ञ चेतावनी वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन सोसाइटी के सलाहकार डॉ. निगेल कॉलर के अनुसार, खरमौर अपने बस्टर्ड-परिवार के अन्य सदस्यों से भी अधिक जोखिम में है — यदि संरक्षण के ठोस प्रयास नहीं हुए तो अगले 20 वर्षों में यह प्रजाति विलुप्त हो सकती है। Wildlife Conservation Society (WCS) India; उद्धृत — IndiaSpend हिंदी 2. मध्यप्रदेश में संरक्षण का इतिहास खरमौर को सर्वप्रथम प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सलीम अली ने रतलाम ज़िले के सैलाना के निकट देखा था; उन्हीं की अनुशंसा पर राज्य सरकार ने संरक्षण हेतु कदम उठाए। Eklavya पत्रिका • सैलाना अभयारण्य (रतलाम): 15 जुलाई 1983 को अधिसूचित — कुल 1296.541 हेक्टेयर, तीन भागों में विभाजित: शिकारवाड़ी (355.570 हे.), शेरपुर और आम्बा। विकिपीडिया; IndiaSpend हिंदी • सरदारपुर खरमौर अभयारण्य (धार): 4 जून 1983 को पानपुरा में स्थापित, आरम्भ में 14 गाँव अधिसूचित; क्षेत्रफल लगभग 348.12 वर्ग किमी, जिसमें 200 वर्ग किमी से अधिक निजी भूमि भी सम्मिलित है। Deshgaon; Mongabay-India • सैलाना अभयारण्य व इसका 10 किमी परिधि का क्षेत्र इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) घोषित है, जहाँ नियमानुसार कोई भी औद्योगिक गतिविधि या पवन चक्की स्थापना वर्जित है। e-Gazette अधिसूचना 2020; IndiaSpend हिंदी 3. वर्तमान संकट — विगत वर्षों में पक्षी की अनुपस्थिति ⚠ ताज़ा पुष्ट रिपोर्ट (2 सितम्बर 2026) सैलाना अभयारण्य में विगत 8 वर्षों से खरमौर प्रजनन हेतु नहीं आया है — इस वर्ष भी सैलाना व आम्बा के कम्पार्टमेंट खरमौर-विहीन रहे। यही स्थिति धार ज़िले के सरदारपुर अभयारण्य की भी है। वन विभाग के एसडीओ दिनेश कुमार जमरे के अनुसार पहाड़ियों पर लगे पवनचक्की प्रोजेक्ट से पक्षियों का प्रवास मार्ग बाधित हुआ है; फेंसिंग के अभाव में मवेशी व नीलगाय द्वारा घास नष्ट करना, आसपास खनन व सड़क निर्माण भी प्रमुख कारण बताए गए हैं। दैनिक अवंतिका, 2 सितम्बर 2026 राज्य विधानसभा में विधायक प्रताप ग्रेवाल के प्रश्न के उत्तर में सरकार ने बताया कि सरदारपुर में यह पक्षी 2023 के बाद से तथा सैलाना में 2021 से नहीं देखा गया। स्वदेश न्यूज़, मार्च 2025 सरदारपुर अभयारण्य — वर्षवार अंतिम दृष्टिगोचर संख्या (सरकारी विधानसभा उत्तर) वर्ष देखे गए खरमौर 2020–21 6 2021–22 6 2022–23 5 (अंतिम बार) 2023 के बाद 0 स्रोत: स्वदेश न्यूज़ (मार्च 2025) 4. मध्यप्रदेश-व्यापी दीर्घकालीन गिरावट के सरकारी आँकड़े मध्यप्रदेश वन विभाग के अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) जे.एस. चौहान ने Mongabay-India को दिए बयान में राज्यव्यापी वार्षिक गणना साझा की: वर्ष 2015 2016 2017 2018 2019 खरमौर संख्या (मप्र) 48 39 19 27 11 स्रोत: J.S. Chauhan, अपर PCCF (वन्यजीव), मध्यप्रदेश — Mongabay-India / The Wire Science, 23 नवम्बर 2020 पहले खरमौर धार व रतलाम के अतिरिक्त झाबुआ, ग्वालियर और श्योपुर ज़िलों में भी प्रवासी रूप से दिखता था, किंतु इन सभी क्षेत्रों में इसकी संख्या तेज़ी से घट रही है। Patrika (BNHS निदेशक किशोर रीठे), जून 2023 ◆ ◆ ◆ 5. गिरावट के मुख्य कारण — विस्तृत विश्लेषण 5.1 पवन ऊर्जा संयंत्र (Windmills) — सबसे बड़ा कारण मध्यप्रदेश में 5,500 मेगावाट पवन ऊर्जा क्षमता है, जिसमें से लगभग 2,519.89 मेगावाट का वर्तमान उत्पादन हो रहा है — इसमें से लगभग 400 मेगावाट अकेले रतलाम ज़िले से आता है, जो खरमौर के मुख्य आवास-क्षेत्र से मेल खाता है। सैलाना क्षेत्र का वार्षिक पवन-घनत्व 200–300 वाट/वर्ग मीटर होने से यह पवन ऊर्जा उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल है — किंतु यही कारक खरमौर के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। IndiaSpend हिंदी, अगस्त 2022 • नियमानुसार सैलाना अभयारण्य के 10 किमी ईको-सेंसिटिव ज़ोन में कोई भी पवन चक्की स्थापित नहीं की जा सकती — किंतु केंद्र सरकार के अपने 2020 के नोटिफिकेशन में ही स्वीकार किया गया कि इस ज़ोन में लगभग 15 पवन चक्कियाँ पहले से संचालित हैं। MoEF&CC नोटिफिकेशन, 2020 • IndiaSpend की स्वतंत्र मौके-पर-जाँच में अभयारण्य के तीनों भागों (शिकारवाड़ी, शेरपुर, आम्बा) के आसपास लगभग 50 पवन चक्कियाँ सक्रिय पाई गईं। IndiaSpend हिंदी क्षेत्र-भ्रमण, 2022 • 2017 में मध्यप्रदेश सरकार ने इसी नियम के आधार पर एक प्रस्तावित पवन ऊर्जा परियोजना को खरमौर संरक्षण हेतु अनुमति देने से मना कर दिया था — यह दर्शाता है कि सरकार को जोखिम की जानकारी वर्षों पहले से थी। Wind-Watch समाचार, जुलाई 2017 • राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थाई समिति की रिपोर्ट में भी दर्ज: "स्थानीय वन अधिकारियों व कर्मचारियों का मानना है कि अभयारण्य की सीमा के पास लगी पवन चक्कियों की आवाज़ खरमौर के प्रजनन-काल में न आने का एक मुख्य कारण हो सकती है।" स्थाई समिति रिपोर्ट, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड • WII 2017 सर्वे रिपोर्ट के सदस्य अजय गाडिकर के अनुसार पिछले 3–4 वर्षों में अभयारण्य के आसपास ऊँची पवन चक्कियाँ स्थापित हुई हैं और उनके निर्माण के दौरान होने वाली हलचल से भी क्षेत्र पर गहरा असर पड़ा है। "विभाग ने ज़्यादा कुछ नहीं किया है। इसके लिए चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन स्तर पर इच्छाशक्ति चाहिए जो नीचे तक पहुँचे, तभी बदलाव दिखेगा — वरना एक दिन हम इस पक्षी को खो देंगे।" — अजय गाडिकर, पर्यावरणविद् व WII 2017 खरमौर स्टेटस-रिपोर्ट सदस्य अभयारण्य से गुज़रने वाली हाई-टेंशन बिजली लाइनों (सैलाना से ~30 किमी दूर नगरा वितरण केंद्र तक) की ऊँचाई खरमौर के उड़ान-मार्ग के बराबर है, जिससे बस्टर्ड-प्रजाति के पक्षियों के तारों से टकराकर मरने का खतरा बना रहता है — यद्यपि यहाँ लगे बर्ड-डायवर्टर के कारण अब तक कोई पुष्ट घटना सामने नहीं आई। यह जोखिम भारतमाला राजमार्ग परियोजना की जैव-विविधता रिपोर्ट में भी दर्ज है। IndiaSpend हिंदी; Business Standard, फरवरी 2020 5.2 भूमि-अधिग्रहण विवाद व स्थानीय असंतोष 1983 में अभयारण्य अधिसूचित होते समय स्थानीय ग्रामीणों की निजी भूमि भी इसके दायरे में आ गई थी, जिसका अधिग्रहण सरकार को करना था — किंतु दशकों बाद भी यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। भूमि-स्वामी न तो खेती कर सकते हैं, न भूमि बेच सकते हैं, और न ही उन्हें उचित मुआवज़ा मिला है। इसी असंतोष के चलते अभयारण्य अधीक्षक ने 2021 में राज्य सरकार को सैलाना अभयारण्य के लगभग 447 हेक्टेयर क्षेत्र (355 व 90 हेक्टेयर के दो हिस्से) को डिनोटिफाई करने हेतु आवेदन भेजा। IndiaSpend हिंदी, अगस्त 2022 "या तो हमें अपनी ज़मीन पर खेती करने दी जाए, या फिर उचित मुआवज़ा दिया जाए ताकि हम कहीं और ज़मीन लेकर खेती कर सकें।" — वासुदेव, सैलाना निवासी, स्थानीय किसान (इंडियास्पेंड को दिया गया बयान) पर्यावरणविद् अजय गाडिकर के अनुसार इसमें ग्रामीणों की कोई गलती नहीं — मुआवज़े के अभाव में उनके मन में अभयारण्य व खरमौर के प्रति स्वाभाविक रूप से नकारात्मक भावना उत्पन्न हुई, जो संरक्षण के मूल उद्देश्य के विपरीत है। 5.3 नीलगाय (घोड़रोज़) का बढ़ता प्रकोप अभयारण्य क्षेत्र में नीलगाय के बड़े-बड़े झुण्ड घास के मैदानों को नष्ट करते हैं, जिससे खरमौर के अंडे देने व छिपने योग्य ऊँची घास समाप्त होती जा रही है। स्थानीय किसान इसे फसल-हानि के लिए भी ज़िम्मेदार मानते हैं, जबकि वन विभाग द्वारा इसका कोई समाधान नहीं निकाला गया है। IndiaSpend हिंदी; दैनिक अवंतिका ◆ ◆ ◆ 6. राष्ट्रीय स्तर पर आबादी के अनुमान — विभिन्न वर्षों के आँकड़े अलग-अलग वर्षों व संस्थाओं द्वारा जारी अनुमानों में भिन्नता है (कार्यप्रणाली व सर्वे-वर्ष के अंतर के कारण) — रील में स्पष्ट रूप से वर्ष व स्रोत सहित उल्लेख करना उचित रहेगा: वर्ष अनुमानित संख्या (भारत) स्रोत जून 2018 264 (conservative अनुमान), 340 नर दर्ज WII / BNHS संयुक्त सर्वे 2018 (वैश्विक आकलन) 300–600 नर (विश्व स्तर पर) BNHS 2018 रिपोर्ट सन्दर्भ जून 2023 लगभग 600–700 (भारत) किशोर रीठे, निदेशक, BNHS जून 2025 लगभग 400 (भारत) ETV भारत रिपोर्ट नोट: संख्याओं में अंतर सर्वे-पद्धति, वर्ष व भौगोलिक कवरेज के अंतर से है — रील में एक ही स्रोत/वर्ष का आँकड़ा उद्धृत करें, कई अनुमानों को मिलाकर प्रस्तुत न करें। वर्तमान में यह पक्षी सिमटकर मुख्यतः गुजरात, राजस्थान (शोकलिया-अजमेर), महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश तक सीमित रह गया है; मध्यप्रदेश में ग्वालियर, श्योपुर, रतलाम, झाबुआ व धार में इसके दिखने के रिकॉर्ड रहे हैं। Patrika, जून 2023 7. संरक्षण के प्रयास — प्रजनन केंद्र प्रस्ताव मध्यप्रदेश वन विभाग गिद्ध-प्रजनन केंद्र की तर्ज़ पर खरमौर के लिए भी एक इंक्यूबेशन/प्रजनन केंद्र बनाने का प्रस्ताव तैयार कर रहा है — यदि यह साकार होता है तो मध्यप्रदेश ऐसा पहला राज्य होगा जो प्राकृतिक रहवास-संरक्षण के साथ-साथ कृत्रिम प्रजनन भी करेगा (अभी तक केवल गुजरात में इंक्यूबेशन प्रयास चल रहे हैं)। Patrika, 25 जून 2023 "यह पक्षी वर्ष में केवल एक बार अंडे देता है। उस अंडे को इंक्यूबेशन में उपयोग कर दूसरी बार प्रजनन कराया जा सकता है, और फिर बच्चों को प्राकृतिक रहवास में छोड़कर संख्या बढ़ाई जा सकती है।" — किशोर रीठे, निदेशक, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (BNHS) पूर्व में मध्यप्रदेश सरकार ने सैलाना अभयारण्य से पक्षी के हटने पर उसे वैकल्पिक क्षेत्र (आम्बा) में स्थानांतरित करने की योजना भी बनाई थी, किंतु विशेषज्ञ अजय गाडिकर के अनुसार आम्बा क्षेत्र में भी मानवीय दखल इतना अधिक है कि वहाँ सफलता की संभावना बहुत कम है। IndiaSpend हिंदी 8. सोन चिरैया (Great Indian Bustard) से समानांतर संकट खरमौर की गिरावट का पैटर्न भारत की सबसे प्रसिद्ध संकटग्रस्त बस्टर्ड प्रजाति — सोन चिरैया (Great Indian Bustard) — जैसा ही है। राजस्थान के शोकलिया क्षेत्र में 1990 के दशक में 55 सोन चिरैया दर्ज थीं, जो 2016 तक घटकर मात्र 4 रह गईं और उसके बाद वहाँ कोई पुष्ट दृष्टिगोचरण दर्ज नहीं हुआ। BNHS वैज्ञानिकों को आशंका है कि यदि तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो खरमौर भी सैलाना-सरदारपुर में वही भाग्य भुगत सकता है। Mongabay-India, नवम्बर 2020 9. मालवा पठार के लिए महत्व सैलाना व सरदारपुर — दोनों मालवा पठार के अंतर्गत रतलाम व धार ज़िलों में स्थित हैं और भारत के गिने-चुने स्थलों में से हैं जिन्हें विशेष रूप से इसी एक पक्षी-प्रजाति के संरक्षण हेतु अभयारण्य घोषित किया गया — जो मालवा क्षेत्र की जैव-विविधता व घास-भूमि पारिस्थितिकी तंत्र के लिए विशेष महत्व रखता है। ⚠ असत्यापित तथ्य — रील में उपयोग से पहले सावधानी बरतें आपके द्वारा उल्लिखित दावा — "वर्ष 2010 में सम्पूर्ण भारत में मात्र 84 खरमौर गिने गए, जिसमें से केवल एक नर्मदा क्षेत्र में पाया गया" — के लिए इस विस्तृत खोज में भी किसी प्रामाणिक सरकारी, WII/BNHS अथवा पत्रिका स्रोत में पुष्टि नहीं मिली। उपलब्ध निकटतम प्रामाणिक आँकड़े 2018 (264, WII/BNHS) व 2023 (600–700, BNHS) के हैं। कृपया मूल रिपोर्ट (स्रोत, दिनांक, प्रकाशक) साझा करें ताकि सत्यापन किया जा सके — अन्यथा इस आँकड़े को रील से बाहर रखने की अनुशंसा है। 10. रील हेतु सुझाई गई विस्तृत संरचना (केवल पुष्ट तथ्यों पर आधारित) • दृश्य 1 — परिचय: खरमौर क्या है, तीन बस्टर्ड प्रजातियों में इसका स्थान, मालवा से सम्बन्ध • दृश्य 2 — 1983 का संरक्षण इतिहास: सैलाना व सरदारपुर अभयारण्य की स्थापना, सलीम अली का योगदान • दृश्य 3 — गिरावट के आँकड़े: 2015 के 48 से 2019 में 11 तक (तालिका सहित) • दृश्य 4 — वर्तमान संकट: 8 वर्षों से एक भी पक्षी नहीं (सितम्बर 2026 रिपोर्ट) • दृश्य 5 — कारण 1: पवन चक्कियाँ — ईको-सेंसिटिव ज़ोन में 15 अवैध टर्बाइन, 2017 का सरकारी इनकार बनाम अब की स्थिति • दृश्य 6 — कारण 2: भूमि-अधिग्रहण विवाद — किसानों की पीड़ा, 40+ वर्ष से लंबित मुआवज़ा • दृश्य 7 — कारण 3: नीलगाय का प्रकोप व अनियंत्रित चराई • दृश्य 8 — तुलना: सोन चिरैया का शोकलिया-अध्याय — चेतावनी जो नज़रअंदाज़ हुई • दृश्य 9 — उम्मीद: प्रजनन/इंक्यूबेशन केंद्र प्रस्ताव, गिद्ध-मॉडल • दृश्य 10 — निष्कर्ष: IUCN अति-संकटग्रस्त श्रेणी, 20 वर्षों में विलुप्ति की चेतावनी 11. स्रोत सूची • दैनिक अवंतिका — "8 साल से सैलाना अभयारण्य में दुर्लभ पक्षी खरमोर की कूद नहीं दिखी", 2 सितम्बर 2026 — awantika.com • स्वदेश न्यूज़ — "अभयारण्य हैं पर खरमोर का पता नहीं" (विधानसभा उत्तर सन्दर्भ), मार्च 2025 — swadeshnews.in • Mongabay-India / The Wire Science — "Only 11 Lesser Floricans Left in Madhya Pradesh, but There's Hope in Rajasthan", 23 नवम्बर 2020 (J.S. Chauhan, Addl. PCCF वन्यजीव मप्र के बयान सहित) — science.thewire.in • IndiaSpend हिंदी (अब ISignal) — "सैलाना के खरमोर अभ्यारण में गायब होते खरमोर, बढ़ती जा रही पवन चक्कियाँ" (शैलेष श्रीवास्तव), 18 अगस्त 2022 — सरकारी गज़ट, EIA रिपोर्ट व राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड समिति रिपोर्ट के सन्दर्भ सहित — hindi.isignal.in • Patrika (भोपाल) — "खरमोर संरक्षण के लिए मध्यप्रदेश में बनेगा प्रजनन केंद्र" (BNHS निदेशक किशोर रीठे के बयान सहित), 25 जून 2023 — patrika.com • Down To Earth (हिंदी) — "भारत में खरमोर की आबादी पर छाया संकट" (WII जून 2018 रिपोर्ट सन्दर्भ) — hindi.downtoearth.org.in • Deshgaon — "लाख कोशिशों के बाद भी नहीं बच पाए खरमोर" (सरदारपुर इतिहास), 9 अक्टूबर 2024 — deshgaon.com • मध्यप्रदेश वन विभाग — सरदारपुर खरमौर अभयारण्य आधिकारिक पृष्ठ — mpforest.gov.in • ETV भारत — "अजमेर बना संकटग्रस्त पक्षी खरमोर की आखिरी उम्मीद" (IUCN स्थिति व 2025 आबादी अनुमान सन्दर्भ), 20 जून 2025 — etvbharat.com • WII / BNHS संयुक्त सर्वेक्षण रिपोर्ट 2017–18 (Lesser Florican Survey) — Wildlife Institute of India यह दस्तावेज़ केवल सार्वजनिक समाचार-स्रोतों (मुख्यतः IndiaSpend हिंदी की खोजी रिपोर्ट, जिसमें सरकारी गज़ट अधिसूचना, MoEF&CC नोटिफिकेशन व राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की समिति रिपोर्ट उद्धृत हैं), सरकारी विधानसभा-उत्तरों तथा WII/BNHS/BirdLife International के प्रकाशित अनुमानों पर आधारित है। जहाँ आँकड़ा किसी अधिकारी अथवा विशेषज्ञ के कथन पर आधारित है, वहाँ स्रोत में स्पष्ट उल्लेख किया गया है। रील स्क्रिप्ट अंतिम रूप देने से पूर्व, यदि संभव हो, तो मूल WII/BNHS PDF रिपोर्ट या मप्र वन विभाग के आधिकारिक पत्र से आँकड़ों की पुनः पुष्टि करने की सलाह दी जाती है।

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Monsoon mein jab Malwa ki ghaasbhoomi hari hoti hai, tab Kharmour lautna chahiye. Lekin Sailana aur Sardarpur ke abhayaranyon mein yeh pakshi varshon se dikhai nahi de raha. Kharmour - Lesser Florican, yani chhota bustard - baarish mein ghaas mein prajanan karta aur keede khakar prakritik saathi banta hai. Madhya Pradesh ke darj aankde 2015 ke 48 se ghatkar 2019 mein 11 reh gaye. September 2026 ki report ke anusaar, Sailana mein aath saal se Kharmour nahi aaya; sarkaari record mein Sardarpur mein 2023 ke baad koi darshan nahi. Pavan chakkiyan, nirmaan, khanan, bijli linein, neelgai aur charai ghaasbhoomi aur aavagaman bigaad rahe hain. Lambit bhoomi muavze ne sthaniya bharosa kamzor kiya. Yahi mod hai: abhayaranya hona, sanrakshan hona nahi hai. Kharmour ati sankatgrast hai. Aavaas bachane ke saath prajanan aur incubation kendra ka prastaav ummeed deta hai - par kaam baaki hai. Ise bachana sirf pakshi ko bachana nahi; Malwa ki ghaasbhoomi, kisano aur poore paaristhitik tantra ko bachana hai.