ToMotion AI logo
Menu
Back to gallery

Public AI explainer video

रेबीज: समय पर बचाव

Vaiksin hote hue bhi rabiz ke lakshan shuru hon to bachna itna mushkil kyon hai? Kaate ke ghaav mein sankramit jaanvar ki laar se virus sharir mein...

Prompt

Source idea used to generate this video.

ऐसा क्यों है कि रेबीज की वैक्सीन होते हुए भी यह एक जानलेवा बीमारी है और ब्रेन तक पहुंचने के बाद दुनिया की कोई भी वैक्सीन आपको बचा नहीं सकती। एक बार सिम्टम्स शुरू हो गए तो रेबीज 100 में से 100 लोगों की जान ले लेता है। और सबसे डरावनी बात यह है कि जब तक आपको पता चलता है कि आप इनफेक्टेड हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इंडिया में हर साल लगभग 56 लाख लोग कुत्ते के काटने का शिकार होते हैं और करीबन 5700 लोग रेबीज से मर जाते हैं। जबकि दुनिया में सिर्फ तीन डब्ल्यूho अप्रूव्ड रेबीज वैक्सीनंस हैं और उनमें से भी दो तो इंडिया में ही बनती हैं। रेबीज का वायरस दिखने में बिल्कुल एक गोली जैसा होता है और यह इनफेक्टेड जानवर के सलाइवा में मौजूद होता है। जब वो जानवर आपको काटता है तो यह सलाइवा के साथ जख्म में चला जाता है और वहीं मांसपेशियों में चुपचाप बढ़ने लगता है और आपके इम्यून सिस्टम को इसकी भनक तक नहीं लग पाती। फिर यह एक नर्व पकड़ता है। हर नर्व के अंदर एक ट्रांसपोर्ट सिस्टम होता है जो चीजों को स्पाइनल कॉर्ड और ब्रेन की तरफ ले जाता है। यह वायरस उस सिस्टम को एक तरह से हाईजैक कर लेता है और सीधा ब्रेन की तरफ ट्रैवल करने लगता है। हालांकि रोज बस कुछ ही सेंटीमीटर। इसलिए काटने की जगह ब्रेन के जितने पास होगी वायरस उतनी ही जल्दी ब्रेन तक पहुंचेगा और यह सफर एक हफ्ते से लेकर पूरे एक साल तक का हो सकता है। लेकिन वैक्सीन वायरस को मारती नहीं है। वो आपके इम्यून सिस्टम को इस वायरस को आइडेंटिफाई करना सिखाती है और इस प्रोसेस में लगभग एक हफ्ता लगता है। वायरस स्लो है। इसलिए अगर टाइम पर वैक्सीन लग जाए तो आपकी एंटीबॉडीज उसे ब्रेन तक पहुंचने से पहले ही दबोच लेती हैं। और अगर जख्म गहरा हो तो जख्म में सीधा रेडीमेड एंटीबॉडीज भी डाली जाती हैं ताकि वायरस को वहीं रोका जा सके और इम्यून सिस्टम को ट्रेन होने का टाइम मिल जाए। पर अगर किसी तरह यह वायरस ब्रेन तक पहुंच जाता है तो इसको रोका नहीं जा सकता क्योंकि अब यह नर्व सेल्स के अंदर छुप जाता है जहां एंटीबॉडीज पहुंच ही नहीं पाती और ऊपर से आपके ब्रेन के चारों तरफ एक सिक्योर लेयर होती है ब्लड ब्रेन बैरियर जो बैरियर आमतौर पर ब्रेन को बचाता है वही अब वायरस को बचाने लगता है। ना एंटीबॉडीज अंदर जा पाती हैं ना दवाइयां और सिम्टम्स भी तब आते हैं जब यह ब्रेन में फैल चुका होता है। यानी सिम्टम्स आने से पहले ही बहुत देर हो चुकी होती है। लेकिन पेशेंट को पानी पीने से डर क्यों लगता है? दरअसल जब यह वायरस ब्रेन में फैल जाता है तो मरीज पानी पीना चाहता है। पर पानी पीते ही गले में इतनी दर्दनाक जकड़न होती है कि वो पानी से डरने लगता है। और इंडिया में रैबीज से मौत की एक बड़ी वजह यह है कि कुत्ते के काटने पर हर पांच में से एक इंसान वैक्सीन लेता ही नहीं। और रेडीमेड एंटीबॉडीज 10 में से सिर्फ एक को ही मिलती हैं। ऊपर से कई जगह यह मिसकंसेप्शन है कि जख्म पे मिर्ची और हल्दी लगाने से जख्म ठीक हो जाएगा और पेट के 14 इंजेक्शन का डर। जबकि वह पुरानी वैक्सीन 2004 में ही बंद हो चुकी है। इसलिए कुत्ता काटे तो जख्म को तुरंत साबुन और बहते पानी से 15 मिनट तक धोइए और उसी दिन वैक्सीन लगवाइए।

Narration

Narration used to create this video.

Video narration

Vaiksin hote hue bhi rabiz ke lakshan shuru hon to bachna itna mushkil kyon hai? Kaate ke ghaav mein sankramit jaanvar ki laar se virus sharir mein dakhil hota hai. Vah vahi kuch samay chhipa rehta hai, phir naso ke raaste dheere-dheere dimaag ki or badhta hai. Ghaav dimaag ke jitna paas, safar utna chhota. Yahin fark hai: vaiksin virus ko turant nahin maarti. Vah aapke sharir ko virus pahchaan kar usse ladne ki taiyari deti hai; ismein samay lagta hai. Samay rahte ilaaj shuru ho, to yeh taiyari virus ko dimaag pahunchne se pahle rok sakti hai. Par dimaag mein pahunchkar lakshan shuru hon, to virus rokna behad kathin hai; rabiz tab lagbhag hamesha jaanleva hota hai. Isliye kaate ka ghaav turant saabun aur bahte paani se 15 minute dhoen, phir bina der kiye chikitsa salaah len. Vaiksin ke bawajood khatra isliye hai: kaate ke baad use apni suraksha taiyar karne ka vakt chahiye - virus ke dimaag tak pahunchne se pahle.